जैन धर्म एवं संस्कृति विशुद्ध आध्यात्मिक एवं अहिंसक संस्कृति है । जो संपूर्ण मानव जाती को विकृति से प्रकृति में समाहित होने का संदेश देती है । सामान्य मानव में मानवीय गुणों का विकास करना जैन धर्म का मूल है । मनुष्य जीवन में व्याप्त क्रोध, मान , माया, लोभ इन कषायो का त्याग कर संपूर्ण प्राणीमात्र के साथ समता भाव रखने से जीवन की अशांती दूर होकर जीवन सुखी बनता है ।
वर्तमान में मनुष्य की सबसे बडी समस्या है , दु: खो से कैसे छूटकारा पाया जाए ?
इसका समाधान है कि , प्रत्येक व्यक्ति को लौकिक शिक्षण के साथ- साथ आध्यात्मिक शिक्षण भी लेना चाहिए । अध्यात्म हमें स्वयं को जानने पहचानने की कला सिखाता हैं । आध्यात्मिक शिक्षा ही मनुष्य के जीवन में सकारात्मकता , स्थिरता एवं पुरुषार्थ का निर्माण कर उसका जीवन सुखी एवं संपन्न बना सकती है । प्रथम तीर्थकर वृषभनाथ से लेकर तीर्थकर महावीर तक इन २४ तीर्थकरो ने स्वय आत्मसाधना करके मोक्ष प्राप्त किया । आत्मा से परमात्मा बनने की वैज्ञानिक प्रक्रिया जैन धर्म और दर्शन में मिलती है ।आत्मविकास एवं सामाजिक विकास के महत्त्वपूर्ण तत्त्व जैन विद्या में समाविष्ट है ।जैन विद्या में धार्मिकता के साथ वैज्ञानिकता एवं सामाजिकता के तत्व मिलते हैं।
आज मनुष्य का सबसे बडा दुर्भाग्य है कि , तथाकथित सभ्यता के विकास के साथ उसकी सहज , सरल एवं स्वाभाविक जीवनशैली उससे छूट गयी है । मनुष्य की तृष्णा , आसक्ति , वासना , अहंकार ही तनावो की मूल जड है । जितनी आसक्ति उतना दुःख , जितनी अनासक्ति उतना सुख । सुख दुःख मानसिक भाव है वस्तुगत नही । अत : मानसिक विकारो पर विजय प्राप्त करना ही वीतरागता है
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जैन दर्शन का कर्मसिद्धांत है , अपने सुख - दुःख का कर्ता और भोक्ता व्यक्ति स्वयं है । सुख दुःख ईश्वरीय कृपा से संबंध नही रखता । इससे मनुष्य को अपने सुख - दुःख का कारण अपने व्यक्तिमत्त्व में ही खोजने की दृष्टि मिलती है ।परिणाम स्वरूप अन्य व्यक्तियो के प्रति कटुता का निवारण होता है । इस तरह जैन दर्शन में आंतरिक पहचान पर अर्थात स्वय को जानने पर बल दिया है ।मनुष्य महान होता है अपने सदाचार से एवं समता ,संयम और पुरुषार्थ से । अत : अपने व्यक्तिमतत्व विकास के लिए जैन विद्या अध्ययन की नितांत आवश्यकता है ।